Thursday, March 26, 2015

बुद्धि के साथ होगा ये गुण भी तो आसानी से मिल जाएगा लक्ष्य

बुद्धिमान व्यक्ति को ‘धैर्यवान’ भी होना चाहिए। कभी-कभी बुद्धि की अधिकता हमें बेसब्र बना देती है, इसलिए बुद्धि के साथ धैर्य होना जरूरी है। बुद्धि के साथ धैर्य होगा तो किसी भी लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

सुंदरकांड से समझ सकते हैं बुद्धि और धैर्य का महत्व

हनुमानजी के लिए सुंदरकांड में मतिधीर शब्द का उपयोग किया गया है। इसका अर्थ है कि वे बुद्धिमान भी हैं और धैर्यवान भी। जब हनुमानजी सीता की खोज में समुद्र मार्ग से लंका जा रहे थे तो रास्ते में सुरसा नाम की राक्षसी से उनका सामना हुआ। सुरसा जब मुंह फैलाकर हनुमानजी को खाने के लिए आगे बढ़ी तो हनुमानजी पहले तो बड़े हुए और फिर बहुत छोटे होकर उसके मुंह से बाहर आ गए थे। वे अपने समय, लक्ष्य और ऊर्जा को लेकर अत्यधिक सावधान रहे। वे जानते थे कि उनका लक्ष्य रामकाज है। सीताजी तक श्रीराम का संदेश पहुंचाना है, इसीलिए मैनाक पर्वत को हनुमानजी ने कह दिया था कि- रामकाजु कीन्हें बिनु मोहि कहां बिश्राम।
दूसरी बात, वे जानते थे कि सुरसा से युद्ध करने पर ऊर्जा और समय दोनों नष्ट होंगे। इसीलिए तुरंत वहां से आगे बढ़ गए। आगे उनके साथ एक और घटना घटी- समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को छाया से ही पकड़ लेती थी। हनुमानजी ने उसको मार डाला और आगे बढ़ चले।
तुलसीदासजी ने हनुमानजी के लिए लिखा है- ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
धीर, बुद्धिमान, वीर श्री हनुमानजी राक्षसी को मारकर समुद्र के पार गए। मतिधीर लिखकर तुलसीदासजी बताते हैं कि इस समय जब शिक्षा के युग में बुद्धिमान होना सरल है, तब धैर्यवान होना उतना ही कठिन होता जा रहा है। बुद्धि के साथ धैर्य का गुण जुड़ जाए तो लक्ष्य पर पहुंचना आसान हो जाएगा।

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